सत्य अहिंसा एवं सत्याग्रह के संरक्षण पर हो फोकस

सत्य अहिंसा एवं सत्याग्रह के संरक्षण पर हो फोकस

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श्रीनगर। सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह सभ्य समाज लोकतांत्रिक औजार हैं। महात्मा गांधी ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने में इन औजारों की प्रमाणिकता साबित किया।

ये बात उभरकर सामने आई हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान का । विषय था “महात्मा गांधी का अमेरिका के आन्दोलनों पर प्रभावः मांगों से लेकर प्रजातन्त्र पर पुनः विचार।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी की शैक्षिक निदेशक जैनेट गोरसन ने व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में ने अपना वक्तव्य दिया। कहा कि न्याय और मानवता को विशेष स्थान देते हुए माना की अमेरिका में 1950 के बाद सभी आन्दोलनों पर गांधी का विशेष प्रभाव पड़ा, चाहे वह नागरिक अधिकार आन्देलन हो, आण्विक शक्ति के विरूद्ध आन्दोलन हो, पर्यावरणीय आन्दोलन हो या फिर नारीवादी आन्दोलन सभी के केन्द्र में हम गांधी के सिद्धान्तों को देखते हैं।

उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि गांधी की अहिंसात्मक शक्ति के आगे कोई भी शक्ति अपना महत्व नहीं रखती। गांधी द्वारा अपनाये गये तरीके पूर्णतः प्रजातान्त्रिक थे जिनका मूल सम्बन्ध मानवीय अस्तित्व व मानवीय गरीमा और स्वतन्त्रता से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा गांधी एक नितान्त कुशल एवं नेतृत्वकर्ता थे। मार्टीन लूथर किंग द्वितीय एवं गांधी के संघर्ष की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मार्टिन लूथर किंग गांधी के अहिंसावादी आन्दोलन से प्रभावित होकर अमेरिका में नस्ल भेदी आन्दोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने महिलावादी आन्दोलनों की चर्चा करते हुए कहा कि वे स्वयं उनका हिस्सा थी एवं उनमें भी हिंसा न करने की बात की गई थी।

यह गाँधी के विचारों का ही असर था कि भारत से लेकर विदेशों तक में उनके बताए रास्ते पर कई आंदोलन बिना किसी हिंसा के सफल हुए। उन्होंने कहा कि गांधी के रास्ते पर न चलने के कारण आज हम बन्दूक की संस्कृति को समाप्त नहीं कर पाये। यह एक सोचनीय विषय है। अगर हमें स्थायी शांति चाहिये तो निसन्देह गांधीवादी तरीकों का पालन करना होगा।

कार्यक्रम संयोजिका प्रो. हिमांशु बौड़ाई ( निदेशक महिला अध्ययन केन्द्र, गढ़वाल विश्वविद्यालय) ने मुख्य वक्ता और प्रतिभागियों का स्वागत और व्याख्यान के विषय मे जानकारी देते हुए कहा कि महात्मा गांधी के जन्म के 150 वर्ष मनाने का अर्थ यह है कि हम उनके कार्यों को आगे कैसे बढ़ाये? गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में एक अंग्रेज की भूमिका निभाते हुये, सत्य अहिंसा एवं सत्याग्रह रूपी औजारों की प्रमाणिकता को सिद्ध किया।

वर्तमान में जब पूरा विश्व अनेक चुनौतियों जैसे- हथियारों की होड़, सेनाओं का विस्तारण एवं पर्यावरणीय समस्याओं का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी ओर शांति हेतु कार्य करने वाले अनेक बुराईयों जैसे रंगभेद की नीति, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सम्बन्धित समस्याएं, भय, आतंकवाद, मानवीय अधिकारों का हनन एवं सदैव युद्ध की स्थिति बने रहना, आदि के लिए सदैव चिंतित दिखायी पड़ते हैं।

प्रो. बौड़ाई ने कहा शांति मात्र युद्ध की समाप्ति नहीं है अपितु विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को उसमें पूर्ण विकास हेतु अवसर व गरीमा प्राप्त हो, वही वास्तविक शांति है जिसका नितान्त अभाव दिख रहा है। आज हम भय के सन्तुलन में जी रहे है। अतः शीघ्र ही एक ऐसी व्यव्स्था को स्थापित करने की आवश्यकता है जो सामुहिक शांतिमय तरीकों पर आधारित है। इसके लिए हमें गांधी के दिखाये रास्ते पर चलना होगा।
यह रास्ता मूलतः अहिंसा, व्यक्ति गरीमा, आत्मिक ताकत या आन्तरिक शक्ति एवं क्षमा पर टिका हुआ है। आज शांति स्थापित करने के लिए युद्ध व आर्थिक शाक्ति का प्रयोग किया जा रहा है जो कि शांति में बाधक हो आयी ये आज हम गांधी को समझे और उस रास्ते पर अग्रसर हो मानवता व न्याय की रक्षा करें।

कार्यक्रम का संचालन राजनीति विज्ञान विभाग की शोध छात्रा मनस्वी सेमवाल के द्वारा किया गया। मनस्वी द्वारा सभी वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद देकर कार्यक्रम की समाप्ती की। इस कार्यक्रम में देश के कई विश्वविद्यालयों के छात्रों और शोध छात्रों ने प्रतिभाग किया।

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  1. गान्धी जी के सिधांत सत्य,अहिंसा,क्षमा,आन्तरिक शक्ती निसन्देह कालजयी हैं।

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