देहरादून। व्यवस्था द्वारा थोपे जा रहे जागरूकता कार्यक्रमों से स्कूल/कॉलेजों में पढ़ाई चौपट हो रही है। सरकारी स्कूल/ कॉलेजों के लिए इसके लिए समय निकालना मुश्किल हो रहा है। शिक्षक परेशान, छात्र कतराने लगे हैं और कहीं न कहीं बात अभिभावकों तक भी पहुंचने लगी है।
राज्य में बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में औसतन हर दिन कोई न कोई जागरूकता कार्यक्रम हो रहा है। इसमें चुपके से कुछ राजनीतिक कार्यक्रम में घुसने लगे हैं। एनजीओ तो सरकारी स्कूलों में कार्यक्रम कराना अपना अधिकार मानने लगे हैं। सनद रहे के अंदाज में इसकी फोटो भी मांगी जा रही हैं। व्यापक प्रचार के लिए मीडिया में भी प्रकाशित करवाया जा रहा है। जागरूकता के नाम पर हो रहे इनक कार्यक्रमों से स्कूल/कॉलेजों में पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
दरअसल, जो भी अतिरिक्त कार्यक्रम हो रहे हैं उसमें कहीं न कहीं पढ़ाई का समय बरबाद हो रहा है। गवर्नमेंट स्कूल/ डिग्री/ पीजी कॉलेजों में ऐसा अधिक दिख रहा है। प्राइवेट कॉलेज ऐसे जागरूकता कार्यक्रम अपने हिसाब और समय देख कर ही करते हैं। जबकि गवर्नमेंट स्कूल/ कॉलेजों में हर हाल में कार्यक्रम कराने का दबाव होता है।
हालात ये हैं कि पढ़ाइे से इत्तर हो रहे कार्यक्रमों से कॉलेजों के छात्र/छात्राएं भी कतराने लगे हैं। इस पर सवाल भी उठने लगे हैं। इसके विरोध में समय-समय पर आवाज भी उठती रही हैं। ये बात अलग है कि फिलहाल आवाज को कई तरह से अनुसूना किया जा रहा है।
हैरानगी की बात ये है कि विश्वविद्यालय भी ऐसे मामलों में अपने ऑटोनोमी का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। बड़े स्तर से सिस्टम तक ये बात पहुंचाने का साहस कोई नहीं दिखा पा रहा है कि स्कूल/ कॉलेज सिर्फ पढ़ाई के लिए ही हैं। दुनिया जहां, देश और समाज के बारे में पढ़ाई के दौरान ही शिक्षक/ प्राध्यापक छात्र/छात्राओं को जागरूक करते रहते हैंं पूर्व में भी ऐसा होता रहा है।