बिकेगा वोट तो पांच साल होगी हितों पर चोट

बिकेगा वोट तो पांच साल होगी हितों पर चोट
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सुदीप पंचभैया।
लोभ-लालच में आकर किसी के पक्ष में वोट करने पर पूरे पांच साल जनता के हितों पर चोट होती है। इसे जनता अच्छे से जानती और समझती है। बावजूद इसके हर चुनाव में ऐसा होता है और खूब होता है। इसका खामियाजा जनता को ही भुगतना पड़ता है।

चुनाव आयोग ने विधायकी का चुनाव लड़ने के लिए खर्चे की सीमा तय की है। प्रत्याशी बड़ी सजगता के साथ इस सीमा के अंदर ही अपना खर्चा बताते हैं। आयोग इसे मान भी लेता है। प्रत्याशियों के स्तर से वोट पाने के लिए होने वाले अनाप शनाप खर्च या तो अधिकारियों की पकड़ में नहीं आता या अधिकारी आंख मूंद लेते हैं।

दावे के साथ कहा जा सकता है करीब 40 प्रतिशत प्रत्याशी सीमा से तीन-चार गुना अधिक खर्च करते हैं। हाल ही में उत्तराखंड राज्य विधानसभा का चुनान संपन्न हुआ। इस चुनाव कुछ प्रत्याशियों ने बेतहाशा पैंसा खर्च किया। वोट पाने के लिए उक्त प्रत्याशियों ने वोटर्स को लुभाया, लालच दिया। कई दिग्गज नेता पैंसे बांटते पकड़े तक गए।

मतदान से पहले की रात उत्तराखंड के कई ग्रामीण क्षेत्रों से इस प्रकार अपुष्ट जानकारी भी आती रही। इस प्रकार के कुछ वीडियो की तो खूब चर्चा हो रही है। अच्छी साक्षरता दर बड़े संघर्ष के बाद अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य में ऐसा सब कुछ होते हुए दिखना पीड़ादायक है। राज्य आंदोलन के दौरान राज्य को सरसब्ज बनाने के लिए कोदा-झंगोरा खाएंगे नारे का अपमान है।

वोट पाने के लिए पैसे बांटने, साड़ी बांटने, राशन बांटने पिछले चार विधानसभा चुनावों के मुकाबले इस बार कुछ ज्यादा ही दिखा। इस बार ऐसा क्यों इसको लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। चिंताजनक बात ये है कि उत्तराखंड के अधिकांश क्षेत्रों में चुनाव में शराब परोसने का चलन एका-एक बढ़ गया है।

मिल रही जानकारी के मुताबिक कई प्रत्याशियों को न चहाते हुए भी शराब परोसनी पड़ी। बगैर शराब के पक्ष में हो हल्ला करने, रैली/सभाओं में भीड़ बढ़ाने, रात-रात काम करने वाला वर्क फोर्स ही नहीं मिल पाता। शराब का खर्चा भी लाखों-लाख में होता है।

रैली में दिहाड़ी मजदूरों की उपस्थिति अब अनिवार्य हो गई है। बगैर इसके रैली में भीड़ ही नही दिखती। निर्दलीय प्रत्याशी ही नहीं सभी राजनीतिक दल ऐसा करते हैं। जाहिर है इस पर लाखों का खर्चा होता है। ये सब मेंटेन किए गए खर्चे के रजिस्टर में नहीं होता।

चुनाव जीतने के लिए बेतहहाशा पैंसा लगाने वाले प्रत्याशी की विधायक बनने के बाद प्राथमिकता क्या होंगी समझा जा सकता है। उत्तराखंड का आम जनमानस इसे अच्छे से समझता भी है। महसूस भी करता है। बातचीत में इसका जिक्र भी करता है। मगर, हर बार क्षेत्र के चंट चकड़ैत उसे नेताओं के जाल में फंसा देते हैं।

चुनाव में थोड़े से लालच में आने से लोग पूरे पांच साल इसकी सजा भी भुगतते हैं। कई तरह से वोट खरीदने वाले चुनाव जीतने के बाद पूरें पांच साल जनता के हितों पर चोट करते हैं। पांच साल प्रत्याशी चुनाव में खर्च की क्षतिपूर्ति और फिर चुनाव लड़ने की व्यवस्था करने में लगाता है। जनहित उसके भाषणों का हिस्सा बन जाता है।

वो लोग तो ठगे ही जाते हैं जो प्रत्याशी की क्षमता देखकर वोट करते हैं। उनका वोट अल्पसंख्यक बन जाता है। वजह चुनाव खरीद-बिक्री पर आधारित होता जा रहा है। इसका अंकगणित 10-30 प्रतिशत बताया जाता है। काम पर भरोसा करने वाले प्रत्याशियों के लिए ये आंकड़ा मुश्किलें बढ़ता है।

अच्छी बात ये है कि कुछ क्षेत्रों से इस प्रकार की सूचनाएं भी हैं कि लोग लोभ लालच से दूर रहे। उन्होंने प्रत्याशियों से सवाल किए। निवर्तमान विधायकों से पांच साल का हिसाब मांगा। ये अच्छी बात है। ऐसे क्षेत्रों का अनुसरण किया जाना चाहिए।

Tirth Chetna

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