देश में लोक का भरोसा खोता तंत्र

देश में लोक का भरोसा खोता तंत्र

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सुदीप पंचभैया।
वैश्विक महामारी कोरोना से पैदा हुए संकट की घड़ी में देश का तंत्र बूरी तरह से फेल हो गया है। कहा जा सकता है कि देश का तंत्र लोक का भरोसा खो गया है। तंत्र लोगां का जीवन बचाने में भी असफल साबित हो रहा है।

भारत के लोग हर पांच साल में देश की व्यवस्थाओं के संचालन हेतु एक सरकार चुनते हैं। सरकार स्थापित तंत्र के माध्यम से राजकाज चलाती है। सरकार पर देश के लोगों के चिकित्सा स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बेहतर जीवन हेतु मौके मुहैया कराने की जिम्मेदारी होती है।

पिछले 72 सालों में सरकारें दावा करती रही हैं कि वो व्यवस्थाएं जनहित में चला रही हैं। हालांकि देश में अभी तक सरकार के दावों का निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं हो सका है। दरअसल, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाई-भतीजावाद, स्वार्थ और तमाम अन्य बातों के भ्रम के चलते सरकार के दावों का मूल्यांकन जनता के स्तर से नहीं हो सका।

सरकारें अक्सर इसका लाभ उठाती रही हैं। आज देश में हालात ये हो गए हैं कि बुद्धिजीवी भी खेमों में बंटकर राजनीतिक विचारों में उलझ गए हैं। कहा जा सकता है कि देश में अब निष्पक्ष बुद्धिजीवियों का भी अभाव हो गया है। मीडिया ने इसमें सरकारों के पक्ष में बड़ा रोल अदा किया। व्यवस्था पर खुलकर बोलने वालों को मीडिया ने एक तरह से हतोत्साहित किया। परिणाम जब कभी भी देश में सरकारों के मूल्यांकन के प्रयास हुए तो ये पक्ष-विपक्ष की तस्वीर पैदा हो गई।

वैश्विक महामारी कोरोना ने पहली बार लोगों को सोचने को मजबूर किया। सांसों के अभाव में दम तोड़ती जिंदगी, उपचार के अभाव में मरते लोग, दवाइयों की कालाबाजारी, प्राइवेट हॉस्पिटलों की काहिली और सरकारी हॉस्पिटल में अव्यवस्थाओं का झोल।

व्यवस्था सुधारने के सरकार के बड़े-बड़े दावे, कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों के बाद उच्च स्तरीय बैठकों का ढोंग और धरातल पर व्यवस्थाएं ढाक के तीन पात जैसी। इन सब बातों ने लोगों के मन में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैदा कर दिया है।

लोगों को लगने लगा है कि ये तंत्र उनके लिए नहीं है। वो इस तंत्र में सिर्फ सरकार चुनने के लिए रह गए हैं। सरकार उनका सिर्फ उपयोग करती हैं। तंत्र वास्तव में खास लोगों के लिए ही काम करता है। उनके हिस्से सरकार की लफ्फाजी और नेताओं के भाषण ही आते हैं।

जिन आम लोगों के दम पर सरकारें बनती हैं उन्हें सिस्टम कोरोना जैसी वैश्विक महामारी में मरने के लिए छोड़ देता है। ये बहाना कतई नहीं चलेगा कि ऐसा पहली बार हो रहा है व्यवस्था बनाने में समय लग रहा है। हर कोई जानता है कि देश को पूरी तरह से हिला देने वाली कोरोना की दूसरी लहर से पैदा होने वाले हालातों की जानकारी पहले से थी। तमाम अन्य देशों के अनुभव सामने थे। बावजूद सरकार व्यवस्थाएं नहीं कर सकी।

सरकार कितनी असफल रही उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोरोना संक्रमित लोगों की सांसे ऑक्सीजन के अभाव में टूटी। कोरोना से बचने के लिए टीकों का इंतजाम नहीं हो पाता।

देश को कोरोना से मुकाबले हेतु खड़ा करने के लिए टीकाकरण जिस गति से होना चाहिए वैसा नहीं हो पाता। हां, दावे जरूर बड़े-बड़े होते हैं। हैरानगी की बात ये है कि राजनीतिक दल इसमें भी सियासत करने से नहीं चूक रहे हैं। राजनीतिक दलों का ये रवैया लोक का मुंह चिढ़ा रहा है और लोक तंत्र को संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं।

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