अधिवक्ता सेवा मंच एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना ने 144 नाली भूमि की खरीद पर उठाए सवाल
मामला पौड़ी जिले के ऐराड़ी गांव का
तीर्थ चेतना न्यूज
देहरादून। अधिवक्ता सेवा मंच एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना ने पौड़ी जिले के सबधारखाल क्षेत्र के ऐराड़ी गांव में 144 नाली भूमि की खरीद पर कई सवाल उठाए। मांग कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।
प्रेस क्लब में मीडिया से बातचीत करते हुए अधिवक्ता सेवा मंच और पहाड़ स्वाभिमान सेना के पदाधिकारियों ने भूमि खरीद प्रकरण को लेकर गंभीर आरोप लगाए। कहा कि भूमि की खरीद के समय दस्तावेजों में भूमि का प्रयोजन कृषि कार्य दर्शाया गया, जबकि रजिस्ट्री के बाद उक्त भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में विभाजित कर बाहरी व्यक्तियों को बेचे जाने की प्रक्रिया की जा रही है।
वक्ताओं ने मांग की कि संबंधित भूमि की खरीद से लेकर वर्तमान स्थिति तक के समस्त राजस्व अभिलेखों, रजिस्ट्री दस्तावेजों, भूमि उपयोग, अनुमति, स्वीकृतियों तथा भूखंडों की बिक्री की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
पत्रकार वार्ता में यह भी आरोप लगाया गया कि संबंधित कंपनी द्वारा वर्ष 2003 से पूर्व की भूमि खरीद का आधार प्रस्तुत किया जा रहा है और देहरादून में वर्ष 1997 में संपत्ति खरीदने का दावा किया गया है। वक्ताओं के अनुसार, जिस तिथि और पंजीकरण संख्या के आधार पर उक्त संपत्ति का दावा किया जा रहा है, उसके संबंध में उपलब्ध अभिलेखों में प्रथम दृष्टया स्थिति स्पष्ट नहीं है।
कहा कि कंपनी वर्ष 1995 में गठित होने का दावा करती है, जबकि वर्तमान में कंपनी के निदेशक मंडल में शामिल व्यक्तियों के निदेशक बनने की तिथियां वर्ष 2016 के बाद की बताई जा रही हैं। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि 2003 से पूर्व की संपत्ति एवं कंपनी की वर्तमान संरचना के बीच वास्तविक कानूनी और स्वामित्व संबंध क्या है।
वक्ताओं ने कहा कि संबंधित कंपनी की गतिविधियों एवं उपलब्ध कॉर्पोरेट जानकारी की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है। यदि कोई कंपनी स्वयं को किसी अन्य प्रयोजन के लिए प्रस्तुत करके वास्तव में बड़े पैमाने पर रियल एस्टेट गतिविधियों में संलिप्त है, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि भूमि खरीद के समय संबंधित विभागों को वास्तविक प्रयोजन की जानकारी दी गई थी अथवा नहीं।
उन्होंने कहा कि किसी भी कंपनी को केवल पुराना पंजीकरण होने के आधार पर उत्तराखंड में भूमि खरीद की सुविधा मिलना राज्यहित में नहीं है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भूमि खरीदने वाली कंपनी की वास्तविक गतिविधि, वर्तमान निदेशक, स्वामित्व संरचना और भूमि के वास्तविक उपयोग की भी जांच हो।
अधिवक्ता सेवा मंच ने आरोप लगाया कि प्रदेश में पुरानी कंपनियों का इस्तेमाल कर भूमि खरीद से संबंधित निर्धारित शर्तों को दरकिनार करने की आशंका बढ़ रही है। वक्ताओं ने कहा कि यदि ऐसी कंपनियों के माध्यम से पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूमि खरीदी जा रही है तो यह उत्तराखंड के मूल निवासियों के भूमि अधिकारों और प्रदेश की पारिस्थितिकी के लिए गंभीर चुनौती है।
सरकार से मांग की कि वर्ष 2003 से पूर्व अस्तित्व में आई कंपनियों के नाम पर उत्तराखंड में खरीदी गई भूमि का जनपदवार ऑडिट कराया जाए और यह जांचा जाए कि संबंधित कंपनियां वास्तव में किस उद्देश्य से गठित हुई थीं तथा उन्होंने भूमि खरीद के बाद उसका उपयोग किस प्रकार किया।
वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2017-18 के दौरान भू-कानून में किए गए संशोधनों तथा विशेष रूप से धारा 154 से जुड़े प्रावधानों की भी पुनः समीक्षा की आवश्यकता है। उनका कहना था कि नगर पालिका, नगर पंचायत और कैंट क्षेत्र जैसे क्षेत्रों में बाहरी व्यक्तियों एवं संस्थाओं द्वारा भूमि खरीद की व्यापक संभावनाओं ने पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि के व्यावसायीकरण का रास्ता खोला है।
पत्रकार वार्ता में कहा गया कि जनपद पौड़ी गढ़वाल के लैंसडौन एवं यमकेश्वर क्षेत्र में भूमि की खरीद-फरोख्त और भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़े अनेक मामले सामने आ रहे हैं। वक्ताओं ने सरकार से इन क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाकर राजस्व, वन, विकास प्राधिकरण और अन्य संबंधित विभागों की संयुक्त टीम से जांच कराने की मांग की।
वक्ताओं ने कैटल गांव में कथित रूप से बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटान के बाद आश्रम निर्माण किए जाने के आरोपों को भी गंभीरता से उठाया। उन्होंने कहा कि यदि निर्माण स्थल तक पहुंचने वाला मार्ग आरक्षित वन क्षेत्र से होकर गुजर रहा है तो इसकी वन विभाग से अनुमति, भूमि की स्थिति और मार्ग निर्माण की वैधता की जांच की जानी चाहिए।
आश्रम द्वारा खरीदी गई भूमि में बहुमूल्य पेड़ों की मौजूदगी के बावजूद भूमि खरीद के दस्तावेजों में उनका उल्लेख नहीं होने के आरोपों की भी जांच की मांग की गई। वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि वन क्षेत्र, पेड़ों और पर्यावरण से संबंधित किसी भी मामले में राजस्व एवं वन अभिलेखों की संयुक्त जांच के बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता, इसलिए सरकार को तत्काल तथ्यात्मक जांच करानी चाहिए।
पत्रकार वार्ता में आश्रमों, होटल, वेलनेस सेंटर और पंचकर्म केंद्रों द्वारा कथित रूप से कराई जा रही बोरिंग का मुद्दा भी उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में भूजल एवं प्राकृतिक जलस्रोत अत्यंत संवेदनशील हैं। यदि बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा बिना पर्याप्त नियमन के भूजल का दोहन किया जाता है तो इसका सीधा प्रभाव स्थानीय ग्रामीणों के प्राकृतिक जलस्रोतों पर पड़ सकता है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि ऐसे सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की बोरिंग, जल उपयोग, जल स्रोतों और संबंधित अनुमतियों का वैज्ञानिक एवं विभागीय ऑडिट कराया जाए।
वक्ताओं ने यमकेश्वर क्षेत्र में आश्रम, वेलनेस सेंटर, पंचकर्म केंद्र और रिसॉर्ट जैसी गतिविधियों के संचालन का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी भूमि को कृषि प्रयोजन के लिए खरीदा गया है तो उस पर बाद में संचालित होने वाली व्यावसायिक गतिविधियों की वैधता की जांच आवश्यक है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि ऐसे सभी मामलों में भूमि उपयोग, नक्शा स्वीकृति, निर्माण अनुमति, पर्यटन विभाग की अनुमति, पर्यावरणीय स्वीकृति, जल उपयोग और अन्य वैधानिक अनुमतियों की जांच की जाए।
वक्ताओं ने कहा कि यदि किसी भूमि की खरीद या उपयोग में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो केवल भूमि खरीदार की ही नहीं, बल्कि संबंधित अभिलेखों को स्वीकृत करने वाले अधिकारियों एवं विभागीय प्रक्रिया की भी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि कई मामलों में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। इसलिए सरकार को जिम्मेदारी तय करने वाली निष्पक्ष जांच व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की जमीन केवल एक आर्थिक संसाधन नहीं बल्कि यहां की आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। इसलिए भूमि कानूनों का उद्देश्य केवल भूमि खरीद-बिक्री को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के हित, पर्यावरण संरक्षण, जल स्रोतों की सुरक्षा और पर्वतीय क्षेत्रों की सामाजिक संरचना को सुरक्षित रखना होना चाहिए।
उन्होंने सरकार से मांग की कि आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखते हुए संबंधित दस्तावेजों की जांच कर तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए और दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति, कंपनी अथवा अधिकारी के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
पत्रकार वार्ता में अधिसवक्ता सेवा मंच के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप चमोली, पहाड़ स्वाभिमान सेना के अध्यक्ष पंकज उनियाल, एडवोकेट नवनीत कुकरेती, एडवोकेट हरेंद्र बेदी, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल डोभाल, एडवोकेट विनीत मिश्रा, एडवोकेट कीर्ति वर्धन बिष्ट,एडवोकेट प्रदीप पासवान आदि मौजूद रहे।
