सच्ची मित्रता की क्या है परख और क्या हैं मायने
रश्मि ममगाईं।
सच्ची मित्रता क्या है। इसकी परख कैसे करें और जीवन में इसके क्या मायने हैं। भौतिकता प्रधान और भागमभाग के इस दौर में ये सवाल अक्सर मन में आता है। हर किसी के मन में इसको लेकर सवाल होते हैं। लोग इसके बारे में जानना भी चाहते हैं।
बीते रविवार को मित्रता दिवस था। हर किसी को बधाइयां मिली होंगी। मित्रता दिवस की अधिकांश बधाइयों में मौजूदा दौर की भागमभाग की छाप साफ महसूस की गई। मित्रता दिवस की बधाइयों में भी वैसी ही औपचारिकताएँ
दिखी जैसे अधिकांश दिवसों पर देखने को मिलती हैं। समाज ऐसे बधाइयों का अभ्यस्त हो चुका है।ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सच्ची मित्रता क्या है और इसकी परख क्या है। नीति शास्त्र से लेकर तमाम लब्ध कवि और लेखकों ने इस पर विचार रखे। अकबर के नवरत्नों में एक रहीम ने मित्रता को ऐसे परखा।
कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत। विपत्ति कसौटी जे कसे, तेई साचा मीत। अर्थात जब आपके पास धन और संपत्ति होती है, तब तो बहुत से लोग तमाम तरीकों से आपके अपने (मित्र) बन जाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति विपत्ति या संकट की कसौटी पर खरा उतरता है और साथ नहीं छोड़ता, वही आपका सच्चा मित्र होता है।
अब आज के दौर पर गौर करें तो सवाल उठता है कि सच्ची मित्रता के मायने क्या होते हैं और सच में हममें से कितने हैं जो वास्तव में दोस्ती को मित्रता को निभा पाते हैं. या समय के साथ सब फीका हो जाता है।
हर उम्र में दोस्ती के मायने शायद अलग भी होते हैं। स्त्रियों से अधिक मित्रता पुरुष निभा पाते हैं। ऐसा मुझे लगता है वह हर परिस्थिति में अपने दोस्तों के लिए उठ खड़े होते हैं। चाहे अच्छाई हो या बुराई सुख या दुख जल्दी साथ नहीं छोड़ते बल्कि कई बार अपनी दोस्ती निभाने के लिए परिवार की नाराजगी भी खुशी से झेल लेते हैं।
दूरियों के बावजूद भी उनकी दोस्ती बरकरार रहती है। स्त्रियों की मित्रता उतनी सजग उतनी समर्थ नहीं होती….कितनी भी घनिष्ठ मित्रता हो जिस दिन लड़की का विवाह होता है वह सब छोड़कर अपनी नई दुनिया में आगे बढ़ जाती है कभी सखियों की याद भी आ जाए मन में कसक तो उठती है चाह भी होती है परन्तु प्राथमिकता नहीं होती।
इसके पीछे सामाजिक व्यवस्थाएॅ और परंपरा का भी बड़ा रोल है। हालांकि कई मायनों में अब स्थितियां बदल रही है। अगर बात स्त्री और पुरुष मित्रता की करें तो यह भी उतनी टिकाऊ नहीं होती क्योंकि दोनों की प्राथमिकताएं अलग होती हैं। पुरुष अपने पुरुषत्व के अहम में या वहम में तन को महत्व देने लगता है और स्त्री मन पर स्थिर हो जाती है और जब प्राथमिकताएं बदलती हैं तो मित्रता स्थिर नहीं रहती।
इन सब उतार चढ़ावों के बावजूद मित्रता से सजीव कोई रिश्ता नहीं क्योंकि अन्य सभी रिश्ते अपेक्षाओं से जुड़े हुए हैं माता पिता को बच्चों से अपेक्षा है बच्चों को माता पिता से.. पति पत्नी को एक दूसरे से अनंत अपेक्षाएँ, भाइयों की अपेक्षाएँ एक दूसरे से.. लेकिन एक मित्रता का रिश्ता ही ऐसा है जहाँ आप जैसे हो जो हो वह बने रह सकते हो , जहां हक जमाने के लिए बदले में कुछ देना जरूरी नहीं, खुलकर मन की बात कह सकते हो जैसे हो वैसे रह सकते हो.. सामने वाले को बुरा न लग जाए… जैसी बात का कोई भय नहीं।
लेखिका कवि/साहित्यकार हैं।
