पुस्तक समीक्षा : डा. संतोष कुमारी संप्रीति का दोहा संग्रह- छोटी-छोटी कोशिशें
नरेश चंद्र उनियाल।
डॉ0 संतोष कुमारी संप्रीति का दोह संग्रह छोटी-छोटी कोशिशें वास्तव में बड़ा प्रयास है। ये प्रयास है समाज को एक बेहतर दिशा की ओर प्रेरित करने का। दोहे हर दृष्टि से अद्यतन हैं। मौजूदा हालात को बयां करते है।
डॉ0 संतोष कुमारी संप्रीति मंचीय काव्य पाठ हो अथवा ऑनलाइन प्रस्तुतियाँ हों, आपने अपने हुनर से हर स्थिति में खूब वाह वाही लूटी है। साहित्य लेखन में भी उनका जवाब नहीं। शिक्षिका, मंच संचालिका और समाज सेविका डॉ0 संतोष कुमारी संप्रीति की जन्मभूमि हरियाणा है तो इनकी कर्मभूमि दिल्ली रहा है।
आपकी साहित्य सेवा के बारे में जितना लिखा, कहा जाय, उतना ही कम होगा। अभी तक आपके चार एकल काव्य संग्रह, चार सम्पादित पुस्तकें (जिनमें से एक में मुझे भी सम्मिलित होने का परम सौभाग्य प्राप्त है।) और 17 साझा काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। देश-विदेश के श्रेष्ठ पत्र पत्रिकाओं में आप निरंतर छपती रहती हैं। इसके अलावा विविध मंचों, आकाशवाणी दिल्ली और दिल्ली दूरदर्शन के चैनल पर कतिपय बार आपका काव्य पाठ और साक्षात्कार प्रसारित हो चुके हैं।
आप काव्य की विविध विधाओं में अपना सृजन कर काव्य पाठ करती हैं, तथापि दोहा सृजन में आपको एक अलग ही महारथ हासिल है, इसी का सुपरिणाम है कि दोहा विधा में हमारे बीच एक श्रेष्ठ दोहा काव्य संग्रह छोटी-छोटी कोशिशें आ रहा है, जो कि सात विषयों पर आधारित है। ये विषय हैं- आध्यात्म, प्रकृति, प्रीति, शिक्षा, देशभक्ति, लोक व्यवहार एवं नीति शिक्षा।
डॉ0 संतोष कुमारी संप्रीति द्वारा विरचित छोटी-छोटी कोशिशें नामक 340 दोहों का यह वृहद संग्रह साहित्यप्रेमियों के लिए एक अनुपम, श्रेष्ठ एवं संग्रहणीय दोहा संग्रह है। दोहे हर दृष्टि से अद्यतन हैं। मौजूदा हालात को बयां करते है।
छोटी-छोटी कोशिशें 340 दोहों के इस संग्रह में कवियत्री- ने समाज को विविध तरीके से नीति की बातें बतलायी हैं, जिनका अनुसरण कर वस्तुतः समाज सुधार निश्चित रूप से हो सकता है। डॉ0 साहिबा की लेखनी का जादू देखिये –
एक सांचे मित्र की वृहद व्याख्या के लिए सिर्फ यह दो पंक्तियां देख लें-
बाहर से सब भाँप लें, अंतस पढ़ा न जाय।
जो अंतस को बांचता, मीत वही कहलाय।।
नफरतों से भरे हुए इस संसार से डॉ0 संतोष कुमारी संप्रीति जी कहती हैं कि –
नफरत दिल में पालकर, करो न कोई काम।
प्रेम भाव से ही सदा, होता जग में नाम।।
मुख में राम बगल में छूरी रखने वालों को सीख देखिए कि –
चिकनी चुपड़ी जो यहां, करते जी की बात।
अक्सर वो ही दे रहे, हमको अब आघात।।
पर्यावरण की मौजूदा हालात पर
धुँआ-धुँआ सी जिन्दगी, बचा न कोई ठौर।
सांसों पर पहरा लगा, संकट का यह दौर।।
आज के समय में इंसान गिरगिट से ज्यादा रंग बदलता है… गिरगिट तो यूँ ही बदनाम हुआ है। यह दोहा काबिले गौर है –
इंसा गिरगिट को करें, नाहक ही बदनाम।
रंग बदलता खुद यहाँ, दूजे सर इल्जाम।।
समाज में व्याप्त रंग भेद की नीति पर कवियित्री का यह कटाक्ष देखिए-
रंग रूप का भेद ज़ब, करे नहीं भगवान।
फिर काहे को तू यहाँ, दर्प करे इन्सान।।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर लेखिका का यथार्थ का आइना दिखाता जबरदस्त व्यंग देखिये –
नागफनी सा हो गया, शिक्षा का आकार।
गुम इसमें ही हो गया, बच्चों का संसार।।
22 जनवरी 2024 को अवध में ऐतिहासिक राम मंदिर में श्री रामलला की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा की गई… इस पावन अवसर पर डॉ0 साहिबा की लेखनी भला कैसे चूकती? वे लिखती हैं –
झिलमिल-झिलमिल हो रहा, अवधपुरी दरबार।
रामलला को देखकर मन में हर्ष अपार।।
भ्रष्टाचार में लिप्त भारत-दुर्दशा पर कवियित्री डॉ0 संतोष कुमारी संप्रीति जी कहती हैं कि-
काबिल कितने आप हैं, पूछे कौन सवाल।
रिश्वत खाता जो यहाँ, होता मालामाल।।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे तो हम भारतीय हैं ही.. हमारे इसी गुण का बखान डॉ0 साहिबा कुछ ऐसे करती हैं कि –
ज्ञान बांटते सब फिरें, ग्रहण करें नहि कोय।
जब खुद पर लागू करें, फलीभूत तब होय।।
कुल मिलाकर छोटी-छोटी कोशिशें नामक इस दोहा संग्रह की कोशिशें छोटी-छोटी नहीं,अपितु बहुत बड़ा प्रयास है इस समाज को एक बेहतर दिशा की ओर प्रेरित करने का।
