कोरोना से शादी-विवाह के तौर तरीकों में आए बदलाव स्थायी हों

कोरोना से शादी-विवाह के तौर तरीकों में आए बदलाव स्थायी हों

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सुदीप पंचभैया।
वैश्विक महामारी कोरोना ने दुनिया और दुनियादारी को कई तरह से प्रभावित किया। समाज में स्टेटस सिंबल बने शादी-विवाह के तौर तरीकों को भी कोरोना ने एक झटके में बदलकर रख दिया। अब इन बदलावों को स्थायी करने की जरूरत है।

वर्ष 2019 के आखिरी सप्ताह से दुनिया पर कोरोना का संकट मंडराने लगा था। 2020 के पहले महीने में संकट ने भारत में भी दस्तक दी। दस्तक के साथ धीरे-धीरे समाज की तमाम व्यवस्थाओं पर इसका असर दिखने लगा। लॉकडाउन में कई बंदिशें लगी।

इन बंदिशों के बीच ही मानव जीवन के 16 कर्म भी सीमित तौर तरीकों से हुए। इसमें शादी-विवाह, जन्म दिन,यज्ञोपवित,चूड़ाकर्म,तेरहवीं, श्रृद्व और परलोक सुधार हेतु होने वाले व्रत उद्यापन के कार्यक्रम शामिल हैं। शुरूआत में सरकार ने शादी-विवाह में पांच-पांच लोगों की अनुममि दी।

इसी प्रकार की अनुमति अन्य कार्यक्रमों के लिए भी थी। अब धीरे-धीरे इसमें ढील देकर संख्या जरूर बढ़ाई जा रही है। मगर, पहले जैसे जलसों और भीड़ की अनुमति अभी भी नहीं है। अब इस व्यवस्था को लोग स्थायी रूप में देखना चाहते हैं। शादी-विवाह का यही आदर्श तौर तरीका है। हल्के ही सही समाज के भीतर से इस प्रकार की आवाजें उठनें लगी हैं। इसे अच्छा संकेत माना जा रहा है।

समाज इसके लिए अब काफी हद तक तैयार हो चुका है। यानि सरकार को शादी-विवाह समेत तमाम खाणी पेणी चखल पखल (प्रीति भोज) में लोगों की संख्या सीमित रखने के लिए कोई कानून बनाना चाहिए। ताकि फिजुलखर्ची पर रोक लग सकें। सरकार के साथ आम लोगों को स्वतःस्फूर्त तरीके से आगे आना चाहिए।

बहरहाल, देखादेखी से बिगड़ी व्यवस्थाओं में अब अधिसंख्या लोग भी सुधार चाहते हैं। वजह शादी-विवाह जैसे पवित्र रिश्ते की शुरूआत अत्यधिक खर्च और कई मामलों में कर्ज के साथ होती है। नवजोड़ां और उनके परिवारों पर इसका असर लंबे समय तक दिखता है। दहेज जैसी कुप्रथा भी देखा देखी का परिणाम है।

हैरानगी इस बात की भी है कि भारत में कभी ऐसी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ युवा खड़े नहीं हुए। परिणाम ये मामले कभी सोशल रिफार्म का हिस्सा नहीं बन सकें। अच्छी बात ये है कि कोरोना ने हर किसी को इस बारे में सोचने को मजबूर किया है।

बहरहाल, लॉकडाउन में हुई शादी-विवाह में बेहद नजदीकी रिश्तेदारों की मौजूदगी को लोग आदर्श स्थिति बता रहे हैं। इस समय हो रही शादी में शामिल हर व्यक्ति एक-दूसरे को पहचानते हैं। किसी को ये पूछने की जरूरत महसूस नहीं होती कि आप यहां कैसे।

शादी में पहुंचने वाले को भी किसी को संबंध/रिश्तेदारी के बारे में नहीं बताना पड़ रहा है। मध्यम और निम्न मध्यय, निम्न आय वर्ग के समाज के लिए तो किसी सौगत से कम नहीं है। यदि समाज और सरकार इसे स्थायी बना सकें तो ये महिला सशक्तिकरण को नया आयाम देगा।

शादी-विवाह की वजह से परिवार का टेंशन बनी रहने वाली बेटियां दबाव से मुक्त होंगी। उनका व्यक्तित्व, समाज के प्रति कुछ करने का जज्बा और निखरेगा। आज के दौर में इसकी खास जरूरत है। समाजशास्त्रियों, शिक्षाविद्व और सामाजिक कार्यकर्ताओं को खुलकर इस दिशा में आगे आना चाहिए।

शादी विवाह ही नहीं तमाम अन्य कार्यक्रम जैसे जन्म दिन,यज्ञोपवित,चूड़ाकर्म,तेरहवीं, श्रृद्व और परलोक सुधार हेतु होने वाले व्रत उद्यापन भी देखादेखी की भेंट चढ़ गए हैं। इन पर बेवजह होने वाले खर्चों पर भी लगाम लगाने की जरूरत है। ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके लिए युवा वर्ग को तैयार करना होगा।

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