शिक्षक संगठनों में अब पहले जैसी बात नहीं

शिक्षक संगठनों में अब पहले जैसी बात नहीं

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देहरादून। शिक्षक संगठनों में अब पहले जैसी बात नहीं रह गई है। परिणाम सरकार और विभाग शिक्षकों से शिक्षण से अधिक शिक्षणेत्तर काम ले रहे हैं। इससे शिक्षा व्यवस्था चौपट हो रही है।

शिक्षक संगठनों को ज्ञान, तर्क और तथ्ययुक्त जानकारियों का पर्याय माना जाता रहा है। कभी शिक्षा से संबंधित एक-एक शासनादेश, निर्णयों की जानकारी शिक्षक नेताओं को मुखजुबानी याद रहते थे। शिक्षक नेता शिक्षा के वर्तमान स्वरूप और भविष्य की जरूरतों पर उनके पास जानकारी होती थी।

अब विभिन्न वजहों से शिक्षक संगठनों में ऐसा कम देखने को मिल रहा है। बहुत कम शिक्षक नेता शिक्षा से जुड़े मुददों पर तथ्यमुक्त तर्क कर पाते हैं। हां, शिक्षक राजनीति से दूर रहने वाले कुछ शिक्षकों के पास शिक्षा, शिक्षा से संबंधित व्यवस्थाओं की जानकारी का भंडार है।

संगठनों के स्तर पर ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। ज्यादातर शिक्षक संगठन समझौतेवादी मोड में अधिक दिखते हैं। व्यवस्था इस बात को अच्छे से भांप चुकी है। परिणाम व्यवस्था ने शिक्षक संगठनों को भी अपने हिसाब से हांकना शुरू कर दिया है।

शिक्षक नेताओं की राजनीतिक निष्ठाओं ने रही सही कसर पूरी करके रख दी है। यही वजह है कि कभी सरकार तो कभी विभाग शिक्षकों पर ऐसे निर्णय थोपते हैं जिनका उनकी सेवा शर्तों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता।

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