खुद भी डूबे और कांग्रेस को भी डूबो गए हरीश रावत

खुद भी डूबे और कांग्रेस को भी डूबो गए हरीश रावत

harish-1कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत खुद भी डूबे और कांग्रेस को भी डूबो गए। स्वयं को नरेंद्र मोदी के मुकाबले खड़ा करने की उनकी कोशिश औंधे मुंह जा गिरी।

ठेठ पहाड़ी चेहरे वाले हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों को उनसे खासी उम्मीदें थी। उन्होंने मीठी-मीठी बातें कर लोगों को मोहजाल में घेरने का प्रयास भी किया। यही वजह रही कि भाजपा के तमाम आरोपों के बाद भी जनता के बीच उनके इमेज ठीक ठाक थी।

बस पार्टी के भीतर अपने प्रतिद्वंद्वियों को ठिकाने लगाने की उनकी मंशा ने सारा खेल बिगाड़ दिया। कांग्रेस से करीब एक दर्जन मजबूत विधायक भाजपा में शामिल हो गए। उनमें से अधिकांश चुनाव जीत गए।

दिग्गजों के पार्टी छोड़ने के बाद हरीश रावत ने खाता नहीं बही वाली लाइन पकड़ दी। कांग्रेस हाईकमान ने भी उन्हें खुले हाथ काम करने का मौका दिया। एक-एक टिकट उनकी इच्छा से दिया गया। टिकट वितरण में भी उन्होंने बागियों को ठिकाने लगाने का पूरा ध्यान रखा।

आरोप कुछ निर्दलीयों पर भी हाथ रखने के भी लग रहे हैं। बहरहाल, इस मद में वो इतने चूर हो गए कि उन्होंने पहाड़ छोड़ दिया। स्वयं हरिद्वार और ऊधमसिंहनगर की दो सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों पर खेत रहे। उनके अधिकांश कैबिनेट मंत्री चुनाव हार गए। प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय भी चुनाव नहीं जीत सकें।

पार्टी की उत्तराखंड में इतनी करारी हार हुई कि पार्टी सोच नहीं पा रही है कि आखिर हार की समीक्षा कहां से शुरू करें। मोदी का जादू प्रदेश के लोगों के सिर चढ़कर बोला। कुल मिलाकर हरीश रावत खुद भी डूबे और उन्हांने कांग्रेस को भी डूबो दिया।

काम करने का फ्रीहैंड मिलने के बाद भी रिजल्ट बेहतर न मिलने की हरीश रावत ने जिम्मेदारी भी ले ली। इस करारी हार के बाद पार्टी में उनकी स्थिति पहले जैसी कतई नहीं रह गई।

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