देश में ये कैसा और किसका महिला सशक्तिकरण

देश में ये कैसा और किसका महिला सशक्तिकरण

- in देहरादून
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डा. मधु थपलियाल
देश में महिला सशक्तिकरण के पीटे जा रहे ढोल की पोल हर दिन खुल रही है। इससे व्यवस्था के साथ ही समाज पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस पर संपूर्णता के साथ गौर करने की जरूरत है।

हाथरस की घटना ने देश को झकझोर कर रख दिया। देश और समाज ऐसे झटकों को सहने का अब अभ्यस्त हो चुका है। वजह आए दिन देश के विभिन्न क्षेत्रों से महिलाओं और बेटियों के साथ ऐसे आमनवीय कृत्यों की खबरें आम हो गई हैं। इन कृत्यों पर दो-चार दिन का हो हल्ला और फिर सब चुप।

कुछ दिनों की चुप्पी के बाद फिर किसी बेटी-बहू के साथ आमनवीय कृत्य। फिर से सड़कों हो हल्ला, देश में ये क्रम लगातार चल रहा है और दिनों दिन बढ़ भी रहा है। मगर, सुधार हेतु कोई ठोस पहल होती नहीं दिख रही है। ये चिंता की बात है।

दरअसल, शासकीय और समाज की व्यवस्था में कहीं न कहीं कोई चूक हो रही है। व्यवस्था महिला सशक्तिकरण की बात करती है। इस दिशा में काम भी हो रहा है। मगर, समाज कहीं न कहीं बदलते दौर में बेहतर व्यवस्था या वर्जनाएं स्थापित करने में असफल हो रहा है। इसका व्यापक असर देखने को मिल रहा है। संस्कार, अनुशासन और संस्कृति की डोर कमजोर पड़ रही है।

महिला सम्मान, सशक्तिकरण और सुरक्षा हेतु समाज में जिस माहौल की अपेक्षा की जाती रही है वो नहीं दिख रहा है। समाज सुधार को धरातलीय प्रयास नहीं हो रहे हैं। यानि समाज में नैतिक शिक्षा का भी अभाव दिख रहा है। स्कूल और शिक्षा नंबर गेम में फंसकर रह गई हैं।

भले ही महिला सशक्तिकरण के ढोल आज ज्यादा पीटे जा रहे हों। मगर, वैदिक काल पर गौर किया जाए तो तब महिलाओं बराबरी का हक अधिक था। तमाम संदर्भ इस बात के प्रमाण भी हैं। बाद के कुछ समय में जरूर महिलाओं की स्थिति बिगड़ी। मगर, तब तमाम समाज सुधारक भी सामने आए।

सती प्रथा की खिलाफत, विधवा विवाह आदि से संबंधित रूढियों पर चोट हुई। बाल विवाह, देव दासी प्रथा, की खिलाफत हुई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, राज राम मोहन राय, स्वामी विवेकानंद, विनोबा भावे, ईश्वरचंद विद्यासागर आदि समाज सुधारकों ने समाज की बेहतरी के लिए बड़े काम किए और महिलाओं से जुड़ी रूढ़ियों को खात्मा किया।

आजादी के बाद महिला संविधान में महिलाओं के अधिकारों और उन्हें स्वावलंबी बनाने की बातें हुई। उनकी सुरक्षा के लिए बहुत से कानून भी हैं। इसमें ऑर्टिकल 14, 15 ए, 15-3, इसके अलावा भी तक कानून महिलाओं की हिफाजत के लिए हैं। बावजूद इसके आम महिलाओं के साथ आनवीय कृत्य नहीं थम रहे हैं।

ऐसे में अब सवाल खड़े होने लगे हैं कि आखिर देश में किन महिलाओं के सशक्तिकरण की बात हो रही है। आखिर किन बेटियों के लिए लोग सड़कों पर उतरते है। दरअसल, अब समाज को इस पर गौर करना होगा कि आखिर बेटियों के साथ अमानवीय कृत्य की कौन सी मानसिकता है। आखिर समाज में ऐसे राक्षस कैसे रह रहे हैं।

समाज में बड़े सुधार की जरूरत है। आजादी के बाद के दौर पर गौर करें तो समाज सुधार के कार्य बहुत कम हुए हैं। तमाम बातों पर समाज में एक स्वर नहीं उभर रहा है। समाज कहीं न कहीं समझौतादी होता दिख रहा है। इसका असर सिस्टम पर भी दिख रहा है। ऐसे में जरूरी है कि प्रबुद्ध लोग सामने आएं। समाज को बड़े ऑपरेशन की दरकार है।

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1 Comment

  1. आपकी बात से सहमत। जिस बात का आपने जिक्र किया है। दर असल जो इस प्रकार के अमानवीय कृत्यो में सम्मिलित रहते है इसका कारण अशिक्षा एवं उसके कारण अपराधीकरण भी एक बड़ा कारण है ।ऐसा मेरा मानना है।

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