प्रिंसिपलों की क्षमता पर सवाल और व्यवस्थागत खामियों पर पर्दा

प्रिंसिपलों की क्षमता पर सवाल और व्यवस्थागत खामियों पर पर्दा

देहरादून। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन, न्यूपा की कार्यशाला में सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपल की क्षमता पर उठे सवालों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

इस कार्यशाला में उत्तराखंड समेत विभिन्न राज्यों के एससीईआरटी के अधिकारियों ने शिरकत की। इसमें प्रिंसिपल में कुशल प्रशासक की क्षमता न होने की बात कही गई। इस पर राज्य के एससीईआरटी ने भी न केवल हां पर हां मिलाई बल्कि 50 प्रतिशत पद सीधी भर्ती की वकालत भी कर डाली।

कार्यशाला में स्कूलों में पटरी से उतर रही व्यवस्थाओं में प्रशासनिक रोल का जिक्र तक नहीं हुआ। व्यवस्थागत खामियों पर भी एससीईआरटी के विशेषज्ञ कुछ नहीं बोले। कुल मिलाकर प्रिंसिपल की क्षमताओं पर सवाल उठाने वालों ने कार्यशाला में व्यवस्थागत खामियों पर पड़े पर्दें को उठाने की जरूरत महसूस नहीं की।

उन्हें प्रिंसिपल का शिक्षक बना रहना नागवार गुजर रहा है। जबकि स्कूल के बेहतर माहौल के लिए जरूरी है कि प्रिंसिपल में शिक्षक के सत प्रतिशत गुण हों। वो पूरी तरह से मैनेजर और कोतवाल न बनें। कार्यशाला में शिक्षक का रिटायरमेंट से एक-दो साल पहले प्रिंसिपल बनने को भी कारण बताया गया।

इसके लिए सरकार पूरी तरह से जिम्मेदार है। प्रमोशन की ऐसी व्यवस्थाएं हैं कि पहला प्रमोशन 20-25 साल के बाद होता है। यहां से शुरू हुआ विलंब का सिलसिला प्रिंसिपल पद तक चलता है।

प्रिंसिपल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि न्यूपा की कार्यशाला में प्रिंसिपल की क्षमताओं पर उठे सवालों का कोई आधार नहीं है। कहा कि जिन मानकों का आधार बनाया जा रहा है उसके लिए प्रशासनिक अधिकारी जिम्मेदार हैं। एसोसिएशन इसके विरोध में 12 दिसंबर को सीमेट पर धरना देंगे।

 

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