एक देश बारह दुनिया ः कितने हाशिये कितनी-कितनी पीड़ाएँ

एक देश बारह दुनिया ः कितने हाशिये कितनी-कितनी पीड़ाएँ
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एक किताब
किताबें अनमोल होती हैं। ये जीवन को बदलने, संवारने और व्यक्तित्व के विकास की गारंटी देती हैं। ये विचारों के द्वंद्व को सकारात्मक ऊर्जा में बदल देती है। इसके अंतिम पृष्ठ का भी उतना ही महत्व होता है जितने प्रथम का। इतने रसूख को समेटे किताबें कहीं उपेक्षित हो रही है। दरअसल, इन्हें पाठक नहीं मिल रहे हैं। या कहें के मौजूदा दौर में विभिन्न वजहों से पढ़ने की प्रवृत्ति कम हो रही है। इसका असर समाज की तमाम व्यवस्थाओं पर नकारात्मक तौर पर दिख रहा है।

ऐसे में किताबों और लेखकों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। ताकि युवा पीढ़ी में पढ़ने की प्रवृत्ति बढे। इसको लेकर हिन्दी न्यूज पोर्टल www.tirthchetna.com  एक किताब नाम से नियमित कॉलम प्रकाशित करने जा रहा है। ये किताब की समीक्षा पर आधारित होगा। ये कॉलम रविवार को प्रकाशित होने वाले हिन्दी सप्ताहिक तीर्थ चेतना में भी प्रकाशित किया जाएगा।

साहित्य को समर्पित इस अभियान का नेतृत्व श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय की हिन्दी की प्रोफेसर प्रो. कल्पना पंत करेंगी।

प्रो. कल्पना पंत ।
जीवन कितना कठिन हो सकता है, जिस स्थिति की हम में से बहुत से लोग कल्पना भी नहीं कर सकते उस जीवन को हाशिये पर स्थित लोग जो समाज की रीढ़ हैं, जिनके बिना ये चलता हुआ दैनिक तंत्र, उत्पादन और जीवन सब धराशायी हो जाएगा रोज जी रहे हैं।

उन्हीं का मर्मांतक और यथार्थ चित्रण लेकर आए हैं शिरीष खरे अपनी पुस्तक एक देश बारह दुनियामें किताब का शीर्षक देखते ही पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न करता है। पुस्तक बारह खंडों में विभक्त है : वह कल मर गया, पिंजरेनुमा कोठरियों में ज़िंदगी, अपने देश के परदेशी, कोई सितारा नहीं चमकता, गन्ने के खेतों में चीनी कड़वी, सूरज को तोड़ने जाना है, मीरा बेन को नींद नहीं आती, वे तुम्हारी नदी को मैदान बना जाएँगे, सुबह होने में देर है, दंडकारण्य यूँ ही लाल नहीं है, खंडहरों में एक गाइड की तलाश, धान के कटोरे में राहत का धोखा।

लेखक ने लिखा है : 2008 से 2017 तक पत्रकारिता के दौरान देश के दुर्गम भूखंडों में होने वाले दमन चक्र का लेखा जोखा और दस्तावेज़ीकरण का अवसर मिला। यह न्यूज़ स्टोरीज़ उसी का नतीजा है। सबसे बड़ी बात यह है कि लेखक की लेखनी में गलदश्रु भावुकता नहीं है अपितु बेहद ईमानदारी से उसने आम आदमी के यथार्थ जीवन की जद्दोजहद और प्रतिदिन जीने के संघर्ष को सामने लाने ,उस यातना को हज़ारों किलोमीटर चल, लोगों से मिल, उनकी ज़िंदगी में एक मित्र की तरह शामिल हो कर लिखने का प्रयास किया है। वह कल मर गया’ भूख और कुपोषण की त्रासदी है, जिसकी वजह से कई बच्चे जीवन को समझने से पूर्व ही काल के गाल में समा जाते हैं।

वह माँ, जिसका इस स्थिति के कारण मरने वाला यह तीसरा बच्चा है, सपाट लहजे में कहती है वह कल मर गया, तीन महीने भी नहीं जिया।यह कुछ कुछ जान मिलिंगटन सिंज के प्ले राइडर्स टु द सी की तरह की त्रासदी है, जिसमें अपने पति और सभी बेटों के मरने के बाद माँ कहती है अब रातों को समुंदर में तूफ़ान आयेगा तब मुझे किसी की भी सुरक्षा की चिंता नहीं रहेगी।

समुंदर अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। जब दूसरी औरतें समुद्र के अस्थिर होने पर रोएँगी, तब मैं चैन में रहूँगी। पिंजरेनुमा कोठरियों में ज़िंदगी, सैक्स वर्कर बनने और उस नारकीय यातना को जीते रहने की हक़ीकत बयान करती है। लेखक ने स्वयं कमाठीपुरा की गलियों में जाकर, उन स्त्रियोंसे संवाद किया है। वे जिन कोठरियों में रह कर अपनी जीविका चलाती हैं वहाँ सुबह शाम, दोपहर, रात का अर्थ एक ही है अपने ग्राहकों के साथ होना।

जिन पिंजरेनुमा कोठरियों में ग्राहकों के घुसने के कई दरवाज़े और चढ़ने की कई सीढ़ियाँ हैं उनसे लड़कियों के निकलने के रास्ते आसान नहीं हैं। घुमंतू तिरमली जनजाति के लिये समाज और देश की व्यवस्था में मज़दूरी के लिए भी जगह नहीं है, न नागरिकता का कोई सबूत है और न सम्मानजनक स्थान। उनके पास लौटने के लिए कोई घर नहीं है। अतः वे अपने देश में परदेशी हैं। कोई सितारा नहीं चमकता में लेखक महसूस करता है की देश के उपेक्षित क्षेत्रों में कई अदृश्य पूर्वोत्तर हैं। यहाँ सैयद मदारी जैसी कई ऐसी जन जातियाँ हैं जिनमें लोग पढ़ना चाहते हैं, देश के साथ कदम मिलाकर चलना चाहते हैं, पर आज़ादी के सात दशक बाद भी न जनगणना में उनका नाम है, न उनकी जाति की ही अपनी कोई पहचान है।

;गन्ने के खेतों में चीनी कड़वी में मज़दूर महीनों तक अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं। यहाँ गन्ने के खेतों के हरे रंग के पीछे एक दारुण संसार है, जहां वे पेट के लिए काम करते हैं पर पेट नहीं भरता है। मीरा बहन को नींद नहीं आती’ क्योंकि वे लोग बार-बार उजड़ने को विवश हैं जिसका कारण गरीबी को दूर न किया जाकर विकास पथ से गरीबों को ही ओझल कर देने का अघोषित एजेंडा है । इस एजेंडे में एक ही आबादी को बार-बार ’सूरत’ या ऐसे ही निकटतम अन्य शहरों से बाहर धकेल कर शहरों के निर्माण और पुनरुद्धार का कार्यक्रम चलाया जा रहा है वहां अलीशान संरचनाओं की नींव में, कई महत्वाकांक्षाएँ दफन हैं।

’वे तुम्हारी नदी को मैदान बना जाएंगे’ में नर्मदा कि वह वेदना अंकित है जिसके कारण यह नदी दुनिया की सबसे संकटग्रस्त नदियों में से एक हो गई है । धरती को श्मशान बना मंगल पर बस्तियां बसाने का स्वप्न कितना मुफीद है और यह कितना दारुण है कि एक एक ऐतिहासिक नदी इतिहास बनने की राह पर है।

’सुबह होने में देर है” क्योंकि आज भी महिलाओं के ’यौनांगों को उनकी सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में देखा जाता है । जब शोषण के बाद वे संघर्ष करती हैं तो उन्हें मुख्यधारा से अलग-थलग कर दिया जाता है कई बार उन पर यौन हमले भी होते हैं ।

निर्धन परिवारों से जबरन उनकी आय के साधन छीन लिए जाते हैं । विरोध करने पर उन्हें मारा-पीटा जाता है परिवर्तन की प्रक्रिया को सबल वर्ग स्वीकार न कर पाता सो लड़ाई अभी बहुत लंबी तथा दुष्कर है। दंडकारण्य यूं ही लाल नहीं है क्योंकि निर्दोष आदिवासी आज भी नक्सली कहकर मारे जा रहे हैं स्कूल नहीं है, स्वास्थ्य सुविधाएं 18वीं सदी को भी मात करती हैं; रक्तपात से सना यह इलाका रक्त की कमी से जूझ रहा है।

जीवन बहुत कठिन है और मृत्यु के असंख्य कारण मौजूद है। कब और कैसे खून से लथपथ लाशें बिछ जाएं। जिसका रंग लाल है लेकिन यह सभ्यता और उसका दुष्चक्र वनवासियों को अंततोगत्वा प्रेमचंद के हल्कू की तरह मजदूर बनने को विवश करता है। हीरे के लालच ने हीरे जैसे जीवन को संकट में डाल दिया है ।

खंडहरों में गाइड की तलाश है’ में मदकूद्वीप, एक सभ्यता के उसके स्थान से विस्थापित जाने का अबूझ प्रश्नचिन्ह है, जहां अतीत और इतिहास पर आस्था ने कब्जा कर लिया है लेकिन उस अतीत और इतिहास के बारे में शोध करने के लिए कोई गाइड मौजूद नहीं है।

धान के कटोरे में राहत का धोखा” है सूखे के बाद अकाल न पड़े इसके लिए सरकार ने राहत की घोषणा की है किंतु सर्वे की गड़बड़ियों के कारण । मध्य भारत के एक बड़े इलाके के साथ छत्तीसगढ़ के ये लोग सूखे की चपेट में तो हैं पर उनके लिए सरकारी राहत भी धोखा साबित हो रही है ।

लेखक ने पत्रकारिता के दौरान, गहरे सरोकारों को लेकर यात्राएं की हैं वह अपने आसपास के ऐसे स्थानों में जाना चाहता है जो ’नो मैंस लैंड” है । जिन्हें आम पर्यटक जाने लायक नहीं समझता बकौल लेखक के वह इसी तरह के स्थानों पर जीवन की भयावहता की ओर मुंह करके ताकना चाहता है ऐसा सच बताना चाहता है जो अविश्वसनीय लगे ।

पुस्तक बेहद पठनीय है और इमानदारी से लिखी गई है और हमें व्यक्ति- व्यक्ति के बीच के जीवन की परिस्थितियों के गहरे फर्क तथा कई समुदायों के नारकीय जीवन की नियति के बारे में न केवल बताती है बल्कि ये रिपोर्ताज विकास और प्रकृति के मध्य प्रकृति और अंततः जीवन के छीजते जाने को लेकर परत दर परत हमारी आंखें खोलते जाते हैं ।

वास्तविकता और छलावे के बीच का फर्क जानने के लिए हम में से हर एक को इसे पढ़ना चाहिए। पुस्तक का पहला संस्करण 2021 में राजपाल एंड संस से आया है और अमेजन पर भी उपलब्ध है।

Tirth Chetna

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