स्कूलों में खेलों को प्रोत्साहित करने की जरूरत

स्कूलों में खेलों को प्रोत्साहित करने की जरूरत
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खेलोगे-कूदोगे तो करोगे नाम
राष्ट्रीय खेल दिवस पर विशेष
राजेश रावत ।

देहरादून। स्कूलों में खेलों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे….. के साथ अब खेलोगे-कूदोगे तो करोगे नाम की ध्वनि भी सुनाई देनी चाहिए।

आज राष्ट्रीय खेल दिवस है। हाकी के जादूगर ध्यानचंद की 117 वीं जयंती है। उनके जन्म दिन को देश सन 2012 से राष्ट्रीय खेल के दिवस के रूप में मनाता है। हाल के सालों में नजर दौड़ाएं तो देश में खेलों की सुविधाएं बेहतर हुई हैं। निवेश भी हो रहा है। सरकार का फोकस भी है।
इन सबके बावजूद खेलों की बेहतरी के लिए स्कूलों में खेलों को उस अनुपात प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है। सरकारी स्कूलों में तो स्थिति और दयनीय है।

सच ये है कि सरकारी स्कूल खेलों की बेहतरी के लिए नर्सरी का काम कर सकते हैं। उत्तराखंड में कुछ साल पूर्व तक सरकारी स्कूलों ने देश, सेना, पुलिस और तमाम संस्थाओं को अच्छे खिलाड़ी दिए हैं। अब ऐसा बहुत कम सुनने और देखने को मिल रहा है। स्कूल स्तर पर स्पोर्टस मैन स्प्रीट जैसी बातें लगातार क्षीज रही हैं। ये चिंता की बात है। इस पर गौर करने की जरूरत है।

दरअसल, स्कूलों में व्याप्त सरकारी तौर तरीकों की वजह से खेल प्रशिक्षक के प्रयास भी परवान नहीं चढ़ पाते। खेल प्रशिक्षकों के लिए ब्लॉक स्तरीय प्रतियोगिताओं में भी छात्र/छात्राओं को प्रतिभाग अपनी जेब ढीली करके करानी पड़ती है। खेलों के माहौल पर इसका सीधा सीधा असर दिख सकता है। सालों से चल रहा ये क्रम कहीं न कहीं खेल प्रशिक्षकों की रूचि और जज्बे पर भी असर डालता दिख रहा है।

राजनीति की प्रयोगशाला बन चुके सरकारी स्कूलों को लेकर सरकार में खेल होते हैं। इसमे सबसे बड़ा खेल निःशुल्क शिक्षा है। निःशुल्क शिक्षा के सरकार खूब ढोल पीटती है। मगर, ये नहीं बताते इसके बदले खेल और अन्य संसाधन पर कैंची चला दी है।

मुख्यमंत्री उदीयमान खिलाड़ी छात्रवृत्ति इस वर्ष से शुरू की गई है। मगर, इससे अधिक जरूरत स्कूलों में खेल का माहौल बनाने की है। आधारिक संसाधन मुहैया कराने की है। खेल प्रशिक्षकों से मूल काम ही लिया जाना चाहिए। खेल प्रशिक्षकों के भर्ती मानक भी कड़े होने चाहिए। विशुद्ध रूप से खेलों के प्रति कटिबद्ध लोगों को ही खेल प्रशिक्षक बनाया जाना चाहिए।
इसके लिए जरूरी है कि स्कूलों में पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे….. के साथ अब खेलोगे-कूदोगे तो करोगे नाम की ध्वनि भी सुनाई देनी चाहिए। समाज इसके लिए तैयार हो गया है। अब स्कूलों में इसके लिए माहौल बनाने की जरूरत है।

                                                                                                                                     लेखक बीसीसीआई के मान्यता प्राप्त कोच हैं।

Tirth Chetna

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