परिवार और समाज के इमोशन को चट करता मोबाइल
सुदीप पंचभैया
स्टेटस सिंबल और जरूरत के बाद मोबाइल फोन अब मुसीबत बन गया है। पूरा परिवार स्मार्ट फोन में कैद होने लगा है। अपनांे के लिए समय नहीं बच पा रहा है। पूरा समय मोबाइल की स्क्रीन चट कर दे रही है। समाज में ये नई प्रकार की व्याधि बन गई है।
शुक्रवार को फुटहिल्स एकेडमी के वार्षिकोत्सव में जाने का मौका मिला। यहां नन्हें छात्र/छात्राओं ने मोबाइल को लेकर एक प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में छात्र/छात्राओं ने बताया कि कैसे पैरेंटस के मोबाइल फोन, लैपटॉप पर व्यस्त होने से वो स्वयं को अकेला महसूस करते हैं।
स्कूल की प्रिंसिपल अनीता रतूड़ी समेत इस प्रस्तुति को तैयार कराने वाले शिक्षक साधुवाद के पात्र हैं। नन्हें छात्र/छात्राओं ने जिस मासूमियत से ये प्रस्तुति दी वो और भी काबिलेतारीफ है। इस प्रस्तुति में बेहद प्रभावी ढंग से बताया गया कि कैसे अपनों के लिए अब समय नहीं रह गया है। पूरा समय मोबाइल की स्क्रीन चट कर दे रही है।
प्रस्तुति ने बताया कि यही हाल रहा तो कुछ सालों के बाद हालात क्या हो सकते हैं। वास्तव में घर/परिवार और समाज पूरी तरह से मोबाइल फोन में कैद होकर रह गए हैं। घर के हर सदस्य अपनों से अधिक मोबाइल को समय दे रहा है। ये एक ही घर के भीतर बिखराव जैसा है। बड़े अपने छोटों और छोटे अपने बड़ों को उतना नहीं जानते जितना अपने मोबाइल को। नाते-रिश्तेदारी और अड़ोस-पड़ोस भी तेजी से सिमट रहे हैं।
हर किसी को हकीकत से अधिक आभासी लोक भा रहा है। वो यहां सुकून महसूस कर रहा है। इस आभासी सुकून की लोगों को बउ़ी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। आम आदमी अभासी लोक में चल रहे बाजार का उपभोक्ता बनकर रह गया है। इस बाजार से कई मालामाल हो रहे हैं और आम आदमी की असली पूंजी यानि परिवार हाशिए पर या कहें बिखराब की स्थिति में है।
हालात ये हो गए हैं कि क्या दुख/तकलीफ और क्या खुशी/ उत्सव हर कोई अपनों से अधिक अपने मोबाइल के साथ व्यस्त हैं। तेजी से बढ़ रही इस प्रवृत्ति ने रिश्तों में गर्माहट समाप्त कर दी है। अबोध बच्चे बगैर मोबाइल स्क्रीन देखे खाना नहीं खा रहे हैं। बच्चा ऐसा बड़ों से सीख रहा है। समाज में मोबाइल फोन नई व्याधि बन गई है। इससे मानसिक बीमारियों का बढ़ना तय है।
समाजिक दुष्परिणाम के अलावा देखें तो मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ (तनाव, चिंता, डिप्रेशन), आँखों पर जोर (सूखापन, सिरदर्द, धुंधलापन), शारीरिक समस्याएं (गर्दन/पीठ दर्द, मोटापा, नींद की कमी, श्टेक नेकश्), एकाग्रता की कमी, और बच्चों में सामाजिक विकास में बाधा शामिल हैं।
अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब डिजिटल डिटॉक्स की बात होने लगी हैं। हालात यही रहे तो इसके हॉस्पिटल की जरूरत भी महसूस होने लगेगी। इस समस्या का निदान समाज के पास है। घर/परिवारों को इस समस्या से बाहर निकलने के लिए सोचना होगा। ये ऐसी व्याधि बन गई है जिसका उपचार सिर्फ और सिर्फ आपके पास है।
मोबाइल को अपने जीवन में हावी न होने दें। इसे एक सुविधा के तौर पर देखें और उसकी हिसाब उपयोग करें। इसे नशा न बनने दें। इस पर निर्भरता को कम करें। इसे 24 घंटे में दो घंटे से अधिक का समय न दें। गूगल बाबा सिर्फ सूचनाएं देता है। ज्ञान अर्जित करें। ये किताबों में हैं। किताब पढ़ने की आदत फिर से विकसित करें।
