ज्योतिष्पीठः ज्ञान-विज्ञान और ब्रह्मलीन शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज
तीर्थ चेतना न्यूज
ऋषिकेश। आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा आठवीं शताब्दी में स्थापित चार पीठों में से उत्तर की पीठ यानि ज्योतिष्पीठ में विवादों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इन विवादों के बीच पीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज का कार्यकाल धर्मानुरागियों को याद आ रहा है। तब पीठ के कार्य ज्ञान-विज्ञान पर खास जोर रहा।
आदि गुरू शंकराचार्य महाराज द्वारा भारत के चारों कोनों में स्थापित पीठ सनातन धर्म, संस्कृति और अद्वैत वेदांत के प्रचार-प्रसार के मुख्य केंद्र हैं। ये केंद्र राष्ट्रीय एकता और धार्मिक दार्शनिक पदवी के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। शंकराचार्य इन पीठों के प्रमुख होते हैं। गुरू परंपरा पर आधारित इस व्यवस्था को धर्मानुरागियों ने हमेशा सिर माथे पर रखा। हालांकि कई मौकों पर तमाम विवाद भी सामने आते रहे हैं।
बहरहाल, चारों पीठों के स्थान, वेद और महावाक्य तय किए गए हैं। इसमें ज्योतिष्पीठ बद्रीकाश्रम का वेद- अथर्ववेद (ज्ञान/ विज्ञान) का प्रतिनिधित्व करता है। इस पीठ का अयमात्मा ब्रह्म है। इस पीठ के प्रथम शंकराचार्य स्वामी तोटकाचार्य को माना जा रहा है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य द्वारा उन्हें नियुक्त किया गया था।
आधुनिक काल में शंकराचार्य के रूप में आसीन रहे ब्रह्मानंद सरस्वती (1941-1953) बताया जाता है कि ज्योतिष पीठ को उन्होंने पुनर्जीवित किया। इसके बाद स्वामी शांतानंद सरस्वती (1953-1970 के दशक) इन्होंने 1953 में कार्यभार संभाला। स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती (1970 के दशक – 1989)।
वर्ष 1989 में कृष्ण बोधश्रम की वसीयत के बाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कार्यभार संभाला। इसके साथ ही विवादों की शुरूआत हो गई। एक पीठ पर दो शंकराचार्य या दो पीठ पर एक शंकराचार्य को लेकर विवाद खूब हुए। इस पीठ से जुड़े विवादों पर राजनीति भी खूब होती रही। प्रयागराज में माघ स्नान को लेकर ज्योतिष्पीठ के मौजूदा शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर विवाद हो गया। इसके बाद ज्योतिष्पीठ को लेकर पूर्व के विवाद भी ताजा होने लगे। पीठ पर शंकराचार्य पद पर आसीन रहे संतों का कार्यकाल को धर्मानुरागी लोग याद करने लगे हैं। पीठ के शंकराचार्य रहे स्वामी माधवाश्रम महाराज इसमें से एक हैं।
स्वामी करपात्री और जगन्नाथ पुरीपीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ ने उन्हें ज्योतिपीठ का शंकराचार्य नियुक्त किया। काशी विद्वत परिषद ने भी उनके शंकराचार्य बनने पर मुहर लगाई थी। उनके शंकराचार्य पद पर रहते हुए पीठ अथर्ववेद (ज्ञान/ विज्ञान) का प्रतिनिधित्व करती दिखी।
माधवाश्रम महाराज स्वयं इसको लेकर जागरूक रहे। उनके आस-पास ज्ञान/ विज्ञान की चर्चा प्रमुख रूप से होती थी। पीठ उत्तर की धार्मिकता का अच्छे से प्रतिनिधित्व करती थी। उनके रहते हैं पीठ को लेकर विवाद और नकारात्मक बातें कम हुई और वो संत के रूप में देवभूमि उत्तराखंड से संदेश देने में कामयाब रहे।
कहा जा सकता है कि स्वामी माधवाश्रम जी का कार्यकाल आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा आठवीं शताब्दी में स्थापित चार पीठों में से उत्तर की पीठ यानि ज्योतिष्पीठ में शानदार रहा। एक बार फिर धर्मानुरागियों को उनका कार्यकाल याद आ रहा है। ज्योतिष्पीठ से संबंधित विवादों को समाप्त करने और इस पीठ का नेतृत्व को सवालों से मुक्त करने के लिए संत समाज इन दिनों सक्रिय है।


