हिंदी का रसूख बढ़ाने को बोलियों को प्रश्रय देने की जरूरत
डा. नीलम ध्यानी ।
राष्ट्र भाषा हिंदी आज कहां पर खड़ी है ? एक भाषा के तौर पर हिंदी की वास्तविकता क्या है ? इसको जानने, समझने और परखने के लिए जरूरी है कि हम देश में बोली जाने वाली क्षेत्रीय भाषा या बोलियों पर गौर करें। बोली जितने अधिक प्रचलित होगी यकीन मानिए हिंदी भाषा उससे अधिक होगी।
भारतेंदु हरिश्चंद्र की यह पंक्तियां निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल इस बात को अच्छे से स्पष्ट कर देती है। 14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी शैली में लिखी हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता दी थी।
1953 से 14 सितंबर को हर वर्ष देश हिंदी दिवस के रूप में मनाता है। इस दिन पर हिंदी को लेकर, हिंदी को लेकर चिंता आदि बहुत देखने और सुनने को मिलती है। हिंदी पखवाड़े भी मनाया जाता है। कामकाज अंग्रेजी में करने वाले तमाम विभाग भी हिंदी पखवाड़े के माध्यम से हिंदी को याद करते हैं। ये सब अच्छी बात है। मगर, इससे आगे भी गौर करने की जरूरत है।
दरअसल, साल में एक दिन हिंदी दिवस तो मनाया जा रहा है। इसके संरक्षण/संवर्द्धन के लिए खूब सुझाव भी आते हैं। इस पर अमल होना चाहिए। मगर, ये नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी को मजबूती क्षेत्रीय भाषाएं/ बोलियों से मिलती है। बोलियां हिंदी भाषा के लिए नींव का काम करती हैं।
हिंदी की चिंता करते-कतरे बोलियांें की संख्या सिमट रही है। उनको बोलने-सुनने और प्रचारित करने के लिए कुछ व्यवस्था नहीं है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 22 भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। बोलियों की संख्या हजारों में है। बोलियां/ क्षेत्रीय भाषाएं तेजी से सिमट रही हैं। ये चिंता की बात है। इस पर गौर किया जाना चाहिए। खासकर पढ़े लिखे लोगों को इसके लिए आगे आना चाहिए।
बोलियों की उपेक्षा का असर हिंदी पर कई तरह से दिख रहा है। बोलियों के सिमटने से समाज में अंग्रेजियत हावी हो रही है। बोलियों से शुरू हुआ भाषाए संकट हिंदी तक पहुंच गया है। हालात ये हो गए कि हिंदी बोलने में संकोच महसूस करने वाला बड़ा तबका बन गया है। कहा जा सकता है कि मातृभाषा के प्रति मन में हीनभावना जैसी बात सामने आने लगी हैं।
समाज/ लोग कुछ भी दावे कर लें, व्यवस्था हिंदी और बोली को लेकर कुछ भी प्रचारित-प्रसारित करें। सच ये है कि समाज में अंग्रेजी भाषा से अधिक अंग्रेजियत हावी हो रही है। ये बोली/भाषा की प्राण वायु को ही दूषित कर रही है। संस्कृति पर भी इसका कई तरह से असर देखा जा सकता है। देखा देखी ने हालात और खराब कर दिए हैं। अंधानुकरण से स्थिति और बिगड़ रही है।
हालांकि ये बात भी सच है कि हिंदी दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली 10 भाषाओं में से एक है। इस मजबूत आधार की वजह हमारी आबादी भी है। ये आंकड़ा इस बात का प्रमाण है। हिंदी का रसूख देश में तभी मजबूत होगा जब देश की क्षेत्रीय भाषाएं/ बोलियों को भी सम्मान मिलेगा। उनको बोलने वालों को प्रश्रय मिलेगा।
नई पीढ़ी को हिंदी से पहले बोली पर गौर कराया जाएगा। ऐसा हुआ तो हिंदी की समृद्धता और बढ़ेगी। हिंदी ही नहीं देश में बोली जाने वाली और भाषाओं को भी खूब प्रोत्सान मिलना चाहिए। देश ही नहीं अंग्रेजी समेत विश्व में बोली जाने वाली किसी भाषा से परहेज नहीं होना चाहिए। मगर, अपनी बोली, अपनी भाषा पहले होनी चाहिए। इससे हमरा अस्तित्व जुड़ा है।
बहरहाल, अस्मिता और गर्व का प्रतीक हिंदी दिवस हमें अपनी भाषा के प्रति गर्व और आदर का भाव रखने की याद दिलाता है। साथ ही बोलियों को भी इसी अनुपात में प्रचारित-प्रसारित के साथ ही प्रश्रय देने को प्रेरित करता है।


