पर्यावरण संरक्षण को धरातलीय प्रयासों की जरूरत

पर्यावरण संरक्षण को धरातलीय प्रयासों की जरूरत

डा. दलीप सिंह।
पर्यावरण संरक्षण को मंचीय चिंताओं को छोड़ धरातलीय प्रयासों की जरूरत है। मात्र पौधा रोपण से बात बनने वाली नहीं है। पौधों की सुरक्षा भी करनी होगी। उन्हें फलने-फूलने की आजादी देनी होगी। हर वर्ष आग की भेंट में चढ़ने से बचाना होगा।

प्रख्यात लोग गायक नरेंद्र सिंह नेगी का वन संरक्षण पर एक गीत है। इस गीत में पौधों की महत्ता का शानदार तरीके से उकेरा गया है। बताया गया है कि औलाद रूठ सकती है। मगर, लगाई गए पौधे कभी नहीं रूठेंगे और हमेशा वफा ही देंगे।

पर्यावरण संरक्षण विचारधारा वर्तमान समय की ही देन नहीं है, अपितु सिन्धु घाटी की सभ्यता में भी इसका प्रमाण मिलता है। जिसमें दो व्यक्तियों को वृक्षों को जड़ से उखाड़ते हुए दिखाया गया है, जिसके मध्य से वृक्षों के देवता को बाहर निकलते हुए दिखाया गया है, जो कि हाथ फैलाते हुए इस विनाश के अन्त की माँग कर रहा है।

हमारे, ऋषि-मुनियों और काव्य मनीषियों का वन तथा वृक्षों के प्रति सहज लगाव था। पौधों का रोपण और संरक्षण उनके लिए एक नैतिक कर्तव्य था। जैवविविधता इसका प्रमाण है। इन विचारों से कि, ”वृक्षारोपण करने वाले व्यक्ति की इस लोक में कीर्ति बनी रहती है और मृत्यु के बाद परलोक में उत्तम फल की प्राप्ति होती है।

ऋषि-ंमुनियों द्वारा प्रकृति को धर्म से जोड़कर प्रकृति प्रदत्त सभी बातों को लोक जीवन में स्थापित किया गया था। ताकि पृथ्वी के सभी जड़ चेतन प्राणियों के प्रति सबका आदर भाव बना रहे। वे भली-ंभाँति जानते थे, कि यदि हमने पर्यावरण और अपने परिवेश के साथ समन्वय स्थापित नहीं किया, तो हमारा जीवन सुखदायी नहीं हो सकता।

भारतीय वेद दर्शन, जंगलों तथा पेड़ों के नीचे लिखे गये, इसी कारण वे जंगलों तथा वनों के वर्णन से परिपूर्ण हैं। उत्तराखण्ड में पेड़ों से चिपककर स्थानीय महिलाओं द्वारा उनकी रक्षा के प्रयासों को इसी भावना का प्रतिरूप माना जा सकता है। प्रकृति में प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक रूप से लाखों पेड़-ंपौधे स्वयं उगते है और प्रकृति उनका लालन-पालन कर उन्हें वनों के रूप में स्थापित करती है।

दुर्भाग्य से जैसे ही वह पौधे बड़े होने लगते है वनों में आग लगने/लगाने के कारण नष्ट हो जाते है। मेरा मानना है कि प्रतिवर्ष वृक्षारोपण कार्यक्रम में खर्च होने वाले धन का 10 प्रतिशत भी इन वनों के संरक्षण में लगाया जाता तो शायद आज वृक्षारोपण की आवश्यकता ही नहीं होती।

वनों में लगने वाली आग से छोटे-ंउचयबड़े पेड़-ंपौधों से लेकर जीव-ंजन्तु, पशु-ंपक्षी जलकर खाक हो जाते हैं। वस्तुतः सरकार को वृक्षारोपण से अधिक ध्यान प्राकृतिक वनों की सुरक्षा पर देने की आवश्यकता है। भले इस कोरोना काल में प्रकृति को आजादी का एहसास हुआ है परन्तु यदि हम जंगलों को आग से बचा सके तो केवल पेड़ों ही नही पूरी जैव-ंविविधिता को नष्ट होने से बचा सकते है।

विश्वभर में प्रतिवर्ष पांच जून पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस दिन वृक्षारोपण कार्यक्रम को बड़े जोर-ंउचयशोर से चलाया जाता है। इस दिन देश में स्थापित प्रत्येक संस्था संसद, विधानसभायें, स्कूल, कालेज आदि विभिन्न संस्थायें इस दिन पौधारोपण करते है जिसमें हमारे प्रतिनिधि, समाजसेवी, पर्यावरणविद् आदि अनेक लोग बड़ी संख्या में शामिल होते है।

यह एक सराहनीय कार्य है।परन्तु इसी समय आग से जंगल जलने की घटनाएं आम होती है। भले ही मौसम की मेहरबानी के कारण इस वर्ष अभी तक जंगल आग से बचे हुए हैं। विभिन्न संस्थाओं में प्रतिवर्ष हजारों पौधों का रोपण होने के बावजूद कुछ गिने-ंचुने पेड़ ही नजर आते है इनमें भी अधिकतर प्राकृतिक होते हैं। वृक्षारोपण कार्यक्रम के बजाय प्रकृति प्रदत्त वनों पर अधिक ध्यान देकर उन्हें केवल आग से भी बचा पाते तो शायद आज वृक्षारोपण की आवश्यकता भी नही पड़ती।
लेखक गवर्नमेंट कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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