ग्रीन बोनसः मजबूत पैरवी का अभाव

ग्रीन बोनसः मजबूत पैरवी का अभाव

green-bonusनीति आयोग में उत्तराखंड को ग्रीन बोनस देने की मांग उठी है। करीब डेढ़ दशक से चल रहा ये क्रम मजबूत पैरवी के अभाव में परवान नहीं चढ़ पा रहा है।

उत्तराखंड में 65 प्रतिशत से अधिक भूभाग वन क्षेत्र है। आबादी, कृषि और विकास आदि की गतिविधियों के लिए बमुश्किल 25 प्रतिशत क्षेत्र ही बचता है। उत्तराखंड की पर्यावरणीय सेवाओं का लाभ पूरे देश को मिल रहा है।

कठोर वन कानूनों से राज्य का विकास चारों ओर से अवरूद्ध हो गया है। राज्य के पास विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए तक जमीन नहीं रह गई है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अवरूद्ध विकास के विरोध में कई बार लोग सड़कों पर आंदोलन के लिए मजबूर होते रहे हैं।

बावजूद इसके उत्तराखंड को इसके ऐवज में केंद्र की ओर से कोई लाभ नहीं दिया जा रहा है। जबकि विभिन्न स्तरों पर इसकी मांग होती रही है। इसको लेकर प्रदेश के आम जनमानस में कई बार नाराजगी भी देखी जा सकती है।

रविवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने नीति आयोग की बैठक में इस मुददे को उठाया। नीति आयोग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है ये देखने वाली बात होगी। करीब डेढ़ दशक से विभिन्न मंचों पर उत्तराखंड को ग्रीन बोनस देने की मांग होती रही है।

बावजूद इसके अभी तक केंद्र की सरकारों ने इस पर गौर नहीं किया। इसकी वजह दिल्ली में मजबूत पैरवी का अभाव है। कम से कम प्रदेश के लोकसभा और राज्य सभा के सांसदों ने इसके लिए एकजुट प्रयास नहीं किए। परिणाम केंद्र सरकार भी ग्रीन बोनस की मांग को ज्यादा तवज्जो नहीं देती।

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