चारधाम यात्राः स्थायी समाधान की जरूरत
सुदीप पंचभैया।
देवभूमि उत्तराखंड में आदिधाम श्री बदरीनाथ समेत चारधाम यात्रा को व्यवस्थित और धर्मानुरागी लोगों के मुताबिक करने के लिए जरूरी है कि स्थायी समाधान की ओर बढ़ा जाए। राज्य गठन के बाद यदि लोग उत्तर प्रदेश के दौर की व्यवस्थाओं को याद करें तो समझा जाना चाहिए कि कहीं न कहीं चूक हो रही है।
कोई बुरा माने या भला माने ये बात सौ टक्का सच है कि राज्य गठन से पहले उत्तर प्रदेश के दौर में चारधाम यात्रा व्यवस्थाएं बेहतर थी। यात्रियों का रेला तब भी आता था। सिस्टम यात्रियों की भीड़ को स्थानीय सहयोग से बेहतर तरीके से मैनेज कर लेता था। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद सिस्टम ने स्थानीय सहयोग लेना एक तरह से बंद कर दिया है। हांका हांकी के चलते चारधाम यात्रा की व्यवस्थाएं पटरी से उतर रही हैं।
दरअसल, राज्य गठन के 24 सालों के बाद भी सरकार ने चारधाम यात्रा के लिए कोई स्थायी सिस्टम ही तैयार नहीं किया है। उल्टे इन सालों में राज्य में तीर्थाटन और पर्यटन का घालमेल तैयार हो गया। ये घालमेल हर तरह से दुखदाई साबित हो रहा है। यूपी के दौरान चारधाम यात्रा जिस तरीके से नियंत्रित होती थी उन्हें राज्य गठन के बाद समाप्त कर दिया गया।
श्री बदरीनाथ धाम में भीड़ को जोशीमठ पर लगने वाला गेट काफी हद तक नियंत्रित कर लेता था। जोशीमठ से बदरीनाथ की ओर शात चार बजे के बाद वाहनांे की आवाजाही बंद कर दी जाती थी। इसी प्रकार श्री बदरीनाथ से भी व्यवस्था होती थी। पांडुकेश्वर मध्य स्थल होता था।
इस गेट सिस्टम से यात्रा मार्ग के सभी कस्बों की आर्थिकी बेहतर तरीके से चलती थी। जोशीमठ, पीपलकोटी,कर्णप्रयाग, रूद्रप्रयाग, श्रीनगर, देवप्रयाग, ऋषिकेश और हरिद्वार में भी इसका असर दिखता था। अब यात्री 12 बजे रात भी श्री बदरीनाथ धाम पहुंच रहे हैं। यानि यात्रा भागम भागी वाली बन गई है। इसका यात्रा मार्ग को खास लाभ नहीं हो रहा है।
यकीन मानिए गेट सिस्टम से अभी भी 20-25 प्रतिशत भीड़ को नियंत्रित किया जा सकता है। तीर्थ पुरोहितों के अनुभवों का लाभ लिया जा सकता है। उनके माध्यम से देश के घरों तक ये संदेश पहुंचाया जा सकता है कि यात्रा पूरे छह माह चलती है। तीर्थ पुरोहित धर्मानुरागियों को प्रेरित भी कर सकते हैं। राज्य के सिस्टम ने शायद ही कभी इस पर गौर किया हो।
ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन ने भी इस वर्ष चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं को पटरी से उतारने में बड़ी भूमिका निभाई। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन से खास लाभ भी शायद ही हो। यात्रा के लिए उत्तराखंड पहुंचने वाले यात्री का ही रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। इससे सिस्टम के पास यात्रियों की भीड़ को नियंत्रित करने के अधिक विकल्प होंगे। इससे यात्रा मार्ग पर लगने वाले जाम को भी बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकेगा।
हैरान करने वाली बात ये है कि गत वर्ष चारधाम के कपाट बंद होने के बाद सरकार हर मंच पर कहती रही है कि इस बार चारधाम यात्रा में और अधिक यात्री आएंगे। इसे उपलब्धि के तौर पर बताने वाली सरकार ने इस हिसाब से तैयारियां शायद नहीं की। तैयारियों में रही कमियों का असर हर स्तर पर दिख रहा है।
देवभूमि की यात्रा को नियंत्रित करने के लिए स्थायी समाधान के साथ ही पूर्व में उपयोग किए जाने वाले तौर तरीकों को अपनाने की जरूरत है। धामों को गेट सिस्टम से रेगुलेट किया जाना चाहिए।
