… और बदल गई हमारी बग्वाल

… और बदल गई हमारी बग्वाल

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ऋषिकेश। पहाड़ की बग्वाल पूरी तरह से बदलकर दिवाली बन गई है। भैला और पैणों का स्वरूप भी पहले जैसा नहीं रहा। इस बदलाव में अपनत्व पूरी तरह से गायब है।

प्रख्यात लेखक भारतेंदु हरीश चंद ने लिखा है कि त्योहार हमारी असली म्युनिसपालिटी होते हैं। यानि त्योहारों के बहाने घरों की सफाई ही नहीं होती बल्कि समाज को जोड़ने का काम भी होता है। भारत में त्योहार ऐसा करते रहे हैं। मगर, अब ऐसा नहीं दिख रहा है।

दरअसल, खुली बाजार व्यवस्था ने भारतीय तीज-त्योहारों को अपने रंग में रंग लिया है। भावनाओं से लेकर अपनत्व में भी बाजार का रंग चढ़ गया है। पहाड़ की बग्वाल यानि दिवाली भी इससे अछूती नहीं रही।

रोशनी का पर्व दिवाली में रोशनी तो पहले के मुकाबले खूब हो रही है। मगर, इससे अपनत्व की भावनाएं पहले जैसी रोशन नहीं हो पा रही हैं। रोशनी के बीच घूप अंधेरा महसूस हो रहा है। रोशनी को दूर तक पहुंचाने वाले भैलों को लोग भूल गए हैं।

मालू के पैकेट में तेल से रिसती स्वाली-पकोड़ी जैसी बात रेडडी मेड और महीनों पहले तैयार डिब्बों में नहीं है। त्योहारों में घर-परिवार, आस-पड़ोस, गांव-गौला में दिखने वाला सहयोग और आमंत्रण सिरे से गायब है।

पुराने लोग ये सब कुछ हैरान परेशान होकर देख रहे हैं। युवा पीढ़ी बाजार के रंग में है। परिणाम पहाड़ की बग्वाल दिवाली बन गई है। धूम धड़ाका ज्यादा हो गया और अपनत्व लगातार सिमट रहा है।

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