पीडीएफ के दोनों हाथों में लडडू

पीडीएफ के दोनों हाथों में लडडू

P.D.Fप्रदेश में निर्दलीय विधायकों का समूह पीडीएफ हर लिहाज से लाभ में दिख रहा है। मन हुआ तो उक्त विधायक कांग्रेस के टिकट से चुनाव लडेंगे और कुछ ऊंच नीच दिखी तो 2012 की राह पकड़ेंगे।

2012 में कांग्रेस को सत्ता दिलाने में निर्दलीयों की अहम भूमिका है। पार्टी 10 विधायकों की टूटने के बावजूद चल रही हरीश रावत सरकार निर्दलीयों की सहारे ही टिकी है। चार निर्दलीय सरकार में कैबिनेट मंत्री भी हैं। करीब साल भर से कयास लग रहे हैं कि उक्त विधायक 2017 का चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ेंगे।

मुख्यमंत्री हरीश रावत और उक्त निर्दलीय विधायक भी कई मर्तबा इस मसले पर हुं हां करते रहे हैं। मगर, हकीकत ये है कि पीडीएफ के विधायकों ने अभी तक तक पत्ते नहीं खोले। इससे कांग्रेस संगठन के साथ पार्टी के आला नेता इरिटेट हो रहे हैं।
दरअसल, पीडीएफ विधायकों के दोनों हाथों में लडडू है।

इसका लाभ उक्त विधायक क्षेत्र की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को भांपने में कर रहे हैं। यानि मन हुआ तो कांग्रेस के टिकट से लड़ेंगे और परिस्थितियां कुछ और नजर आई तो 2012 का रास्ता चुनेंगे। मौजूदा स्थिति में पीडीएफ कोटे के चारों मंत्री अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में लाभ की स्थिति में नजर आ रहे हैं।

कारण पांच साल कैबिनेट में रहे उक्त नेताओं को कांग्रेस शायद ही इग्नोर कर सकें। जबकि उक्त विधायकों के पास कांग्रेस को राम-राम करने के तमाम बहाने मौजूद हैं। यही नहीं यदि उक्त विधायक निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतरते हैं तो कांग्रेस के पास उन पर हल्ला बोलने की खास संभावना नहीं होगी। कारण उक्त विधायकों पर हल्ला यानि कांग्रेस सरकार पर सवाल होंगे।

इस असमंजस को अब कांग्रेस भी समझने लगी है। उक्त विधायकों के क्षेत्रों में पार्टी के नेताओं की तैयारी भी इस असमंजस से प्रभावित हो रही हैं। मगर, पीडीएफ की ठोस राजनीतिक चालों के सामने उसके दिग्गज नेता बेबस से नजर आ रहे हैं।

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